चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने अपना असयोग आंदोलन वापस ले लिया था, तब हजारों की संख्या में युवा खुद को धोखे का शिकार समझ रहे थे. अशफ़ाक उल्ला खां उन्हीं में से एक थे. उन्हें लगा अब जल्द से जल्द भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिलनी चाहिए. इस उद्देश्य के साथ वह क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के साथ जुड़ गए. आर्य समाज के एक सक्रिय सदस्य और समर्पित हिंदू राम प्रसाद बिस्मिल अन्य धर्मों के लोगों को भी बराबर सम्मान देते थे. वहीं दूसरी ओर एक कट्टर मुसलमान परिवार से संबंधित अशफ़ाक उल्ला खां भी ऐसे ही स्वभाव वाले थे. धर्मों में भिन्नता होने के बावजूद दोनों का मकसद सिर्फ देश को स्वराज दिलवाना ही था. यही कारण है कि जल्द ही अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल के विश्वासपात्र बन गए. धीरे-धीरे इनकी दोस्ती भी गहरी होती गई.
अशफ़ाक़ उल्लाह खां कि शायरी
जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा, जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा? बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”. जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ, मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं; हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगा, और जन्नत के बदले उससे यक पुनर्जन्म ही माँगूंगा
भगवान् ने रजनीकान्त को बर्खास्त करके नरेन्द्र भाई को कार्यभार सौंपा नरेन्द्र भाई वह सारे कार्य करेंगे, जो ईश्वर भी नहीं कर पाता था| केदार बाबा के यहाँ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है की ईश्वर से भी नहीं बन पाने वाले कार्यों को करने के लिए अब भगवान नमो आन्दोलन के प्रचारमंत्री और गुजरात में धर्मराज स्थापित करने वाले अलोकिक लोकतांत्रिक नेता सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञानी और सर्वत्र उपस्थित नरेंद्रभाई को रजनी कान्त के कार्यों का भार सौंपा गया है| विज्ञप्ति के अनुसार उन्होंने कार्यभार संभालते ही अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए अपने कन्धों पर बिठाकर 15000 लोगों को केदारनाथ से बाहर निकाला| सभी जमीनी रास्ते बंद होने के कारण उन्हें हवाई मार्ग से ये कार्य करना पड़ा| बताया जाता है की उनके हाथ में एक दूरबीन थी, जिसका प्रयोग करते हुए उन्होंने केवल गुजरातियों को चिन्हित किया और उन्हें ही बचाया| विज्ञप्ति में बताया गया है कि जब इस बात की खबर कुछ दुसरे देवताओं को लगी की नरेन्द्रभाई ने केवल गुजरातियों को बचाया है तो तो देवता बहुत नाराज हुए और नरेंद्र को याद दिलाया की अब उनका स्तर राष्ट्रीय है और उन्हें संकीर्णवाद से बचना चाहिए| इस फटकार के बाद, नरेंद्र जी ने तुरंत केदारनाथ को बनाने की जिम्मेदारी खुद पर दिए जाने की मांग कर दी है|वे देश में घूम घूम कर मांग करने वाले हैं कि भारत पर शासन करने वाले अधर्मियों को हटाकर देश की बागडोर उन्हें सौंपी जाए ताकि वे देश में धर्म का शासन लागू कर सकें, जिससे ईश्वर कुपित होकर केदारनाथ जैसा तांडव पुनः न करे
आज फिल्म संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन भाग दो के 9 वर्ष पुरे हो गये और इसी के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री कार्यालय ने रिपोर्ट टू द पीपल २०१२-१३ नामक किताब को वितरित किया और इन्टरनेट संस्करण भी जारी किया और मैंने इसका इन्टरनेट संस्करण डाउनलोड किया ज्यादा तो मैंने भी नही देखा पर एक बात तो हैं उसमे दिल्ली मेट्रो का बहुत गुणगान किया जा रहा है कि वह सरकार कि देंन हैं पर क्या वाकई में मेट्रो सरकार कि देंन हैं। या मेट्रो मैन डॉक्टर ई श्रीधरन की जिन्होंने इस प्रॉजेक्ट को अपने स्टाइल से पूरा किया। जिन्होंने गैर जरूरी लोगो की दखलअंदाजी नजर अंदाज करते हुए, उन्होंने मेहनती लोगों का चयन किया। जहां एक टेंडर को हमारे देश में जारी करने में 6 से 9 महीनों का समय लग जाता है, वहां उन्होंने अपना काम सिर्फ 19 दिनों में ही पूरा कर लिया । जब सरकार ने इस प्रॉजेक्ट के लिए पैसे मुहैया कराने से हाथ खड़े कर दिए, तब डॉ. श्रीधरन ने सरकार का रोल ही काट दिया और जैपनीज बैंक ऑफ इंटरनैशनल को-ऑपरेशन से 5 बिलियन यूएस डॉलर के लोन की मंजूरी ली। दुनिया के टॉप-मोस्ट टैलेंटेड लोगों से उन्होंने अपनी टीम बनाई। यह सब भारत के इतिहास में पहली बार हो रहा था। नतीजतन, मेट्रो का पहला फेज निर्धारित समय से तीन साल पहले और बिना किसी तरह के भ्रष्टाचार के, बजट के अंतर्गत पूरा हुआ। और तो और सरकार ने उनसे एक और शर्त रखी कि जनता को कोई परेशानी न हो। डॉ. श्रीधरन ने न केवल इन बातों का ध्यान रखा, बल्कि जितना हो सके जनता को इसके चल रहे काम की भनक से भी दूर रखा। कहीं ऊपर से तो कहीं जमीन के नीचे से उन्होंने मेट्रो का रूट तैयार करने की प्लैनिंग की। डॉ. श्रीधरन ने दिल्ली मेट्रों को निर्धारित समय से तीन साल पहले और निर्धारित राशि से कम के बजट में सौभाग्यपूर्वक पूरा कर दिखाया। अब मेट्रो निर्माण प्रक्रिया में चाहे वो केंद्र सरकार हो या फिर दिल्ली सरकार मुझे तो नही लगता कि उनका किसी प्रकार का सहयोग हो । पर आखिर क्यूँ चुनाव नज़दीक होने कि वजह से सरकार दिल्ली मेट्रो को अपनी उपलब्धि बनाने पर तूली हुयी है और टेलीविज़न पर भी ये जोर शोर पर प्रचारित किया जा रहा है । अगर किसी को समझ आये तो मेरा भी ज्ञान बढाना महेरबानी होगी
Anas guru